सेवा धर्म परम गहन है, योगियों द्वारा अगम्य कर्म है,सेवा धर्म कठिन जग जाना, यह कथन तुलसी नें माना,भक्ति का सार है सेवा, प्रभुकृपा का आधार है सेवा,विश्वबंधुत्व का विस्तार है सेवा, ब्रह्म सी निराकार है सेवा,सेवा भाव वह दैव गुण है, सब सद्गुणों में उत्तम है,दे शरीर दधीचि नें माना, यह उद्धात साधना अनुपम है।

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